| कनक भवन : सीता का अंत:पुर |
| जिस क्षण भगवान के मन में यह कामना उठी, उसी क्षण अयोध्या में महारानी कैकेयीको स्वप्न में साकेत धाम वाला दिव्य कनक भवन दिखाई पडा। महारानी कैकेयीने महाराजा दशरथ से स्वप्न में दिखे कनक भवन की प्रतिकृति अयोध्या में बनाने की इच्छा व्यक्त की। दशरथ जी के आग्रह पर शिल्पी विश्वकर्मा कनक भवन बनाने के लिए अयोध्या आए। उन्होंने अति सुंदर कनकभवनबना दिया। माता कैकेयीने वह भवन अपनी बहू सीता को मुंह-दिखाई में दे दिया। विवाह के बाद राम-सीता इसी भवन में रहने लगे। इसमें असंख्य दुर्लभ रत्न जडे हुए थे। श्रीकृष्ण ने पाया श्रीविग्रह माना जाता है कि बाद के काल में यह भवन वीरान हो गया। द्वापर युग में श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी सहित जब अयोध्या आए, तब तक कनक भवन टूट-फूट कर एक ऊंचा टीला बन चुका था। भगवान श्रीकृष्ण ने उस टीले पर परम आनंद का अनुभव किया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि इसी स्थान पर कनक भवन अवस्थितथा। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने योग-बल द्वारा उस टीले से श्रीसीताराम[युगल सरकार] के प्राचीन विग्रहोंको प्राप्त कर वहां स्थापित कर दिया। विक्रमादित्य ने किया जीर्णोद्धार मान्यता है कि आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार करवाकर सीताराम के युगल विग्रहोंको वहां पुन:प्रतिष्ठित किया था। महाराज विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया विशाल कनक भवन एक हजार वर्ष तक ज्यों का त्यों बना रहा। बीच-बीच में उसकी मरम्मत होती रही। इसके जीर्णोद्धार की दूसरी सहस्त्राब्दिमें अयोध्या पर अनेक बार यवनों का आक्रमण हुआ, जिसमें लगभग सभी प्रमुख देव स्थान क्षतिग्रस्त हुए। कनक भवन भी तोडा गया। इस भवन को व्यवस्थित रूप से बनवाने का श्रेय ओडछेकी रानी वृषभानुकुंवरिको जाता है। ओडछेके महाराज सवाई महेंद्र प्रताप सिंह जूदेव की धर्मपत्नी महारानी वृषभानुकुं वरिजी भगवान श्री राम की अनन्य भक्त थीं। उन्होंने कनक भवन में सीता-राम विग्रह की पूर्ण विधि-विधान से प्रतिष्ठा कराई। दिव्य युगल सरकार मान्यता है कि कनक भवन में दाहिनी ओर स्थित छोटे दिव्य मनोहर युगल सरकार त्रेतायुगके हैं। विक्रमादित्य ने इनको ही पुन:प्रतिष्ठित किया था। इनकी बाईओर जो परम सुंदर कनक भवन विहारी-विहारिणी जू हैं, उन्हें महारानी वृषभानुकुंवरिने प्रतिष्ठित किया है। दोनों विग्रह अनुपम और विलक्षण हैं। इनका दर्शन करते ही लोग मंत्रमुग्ध होकर अपनी सुध-बुध भूल जाते हैं। वास्तव में कनक भवन सीता-राम का अन्त:पुर है। |
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
कनक भवन : सीता का अंत:पुर
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्
| सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् |
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| राजा जनक ने अपने गुरु से परामर्श किया तो उन्होंने इंगित किया कि यदि राजा स्वयं सोने के हल से धरती को जोतें तो वृष्टि होगी। राजर्षि जनक ने यही किया। हल चलाते समय उसकी नोक किसी वस्तु से फंस गई। वहां जमीन खोदकर देखा गया तो एक स्वर्ण-कलश प्राप्त हुआ। कलश का ढक्कन हटाने पर उसमें एक अति सुंदरी नवजात बालिका मिली। यही बालिका सीता के नाम से प्रसिद्ध हुई। आज भी हल जोतने से जो रेखा बनती है उसे सीता ही कहते हैं। राजा जनक ने उसका अपनी पुत्री की तरह लालन-पालन किया इसलिए उनका नाम जानकी पडा। जानकी का विवाह स्वयंवर के माध्यम से पुरुषोत्तम राम से सम्पन्न हुआ। राम जहां विष्णु के साक्षात् अवतार माने जाते हैं, वहीं जानकी भी पराशक्ति के अवतार के रूप में पूजित हैं। रामायणों एवं पुराणों ने देवी जानकी के प्रति अमित श्रद्धा व्यक्त की है। नारियों की सर्वश्रेष्ठ विशेषता उनका पातिव्रत्य धर्म ही है। राम के साथ वन जाने के लिए सीता अड गई। यह उनके एकनिष्ठ पातिव्रत्य का ही प्रमाण है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने उनके पातिव्रत्य को रेखांकित करते हुए सीता द्वारा राम को इन शब्दों में संबोधित कराया है- आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा। स्वानिपुण्यानि भुंजाना: स्वं स्वं भाग्यमुपासते॥ भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ। अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि॥ हे आर्यपुत्र! पिता, माता, भ्राता, पुत्र तथा पुत्रवधू ये सभी अपने-अपने कर्मो के अनुसार सुख-दुख प्राप्त करते हैं पर हे पुरुषश्रेष्ठ! एक मात्र पत्नी ही पति के कर्म-फलों की संगिनी होती है अत: आपके लिए जो वनवास की आज्ञा हुई है वह मेरे लिए भी है। अत: मैं भी आपके साथ वन में वास करूंगी। गोस्वामी तुलसीदास ने सीता को राम से कभी पृथक नहीं माना अत: उन्होंने रामचरित मानस के आरंभ में यह स्पष्ट किया कि जिस तरह वाणी और उसके अर्थ तथा जल और उसकी लहर मात्र कहने को अलग-अलग हैं पर वस्तुत: एक ही हैं, उसी तरह सीता और राम कहने को पृथक-पृथक हैं पर वस्तुत एक ही हैं। उनके चरणों की मैं वंदना करता हूं क्योंकि दोनों को दीन-दु:खी परम प्रिय हैं- गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउंसीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥ गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कृति के आरंभ में जो सीता-संबंधी संस्कृत-वंदना का श्लोक दिया है, उससे स्पष्ट होता है कि माता जानकी ही जगत की उत्पत्ति, उसके पालन और संहार करने वाली हैं। यह सभी क्लेशों को हरती हैं एवं सभी प्रकार के कल्याणों की कतर्ृ हैं- उद्भवस्थितिसंहारकारिणींक्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥ पद्मपुराणमें भगवती जानकी को साक्षात् लक्ष्मी कहा गया है- सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवा वै वानरास्तथा। गृहं पुत्र गमिष्यामि स्थिरकीर्तिमवाप्नुहि॥ सीता (साक्षात्) लक्ष्मी हैं, आप (साक्षात्) विष्णु हैं और ये वानर देवस्वरूप हैं .... आप दोनों अमर यश प्राप्त करें ...। माता जानकी का ध्यान सब कष्टों से निवृत्ति देने वाला एवं सारी मनोवांक्षाओं को पूर्ण कर सुख-शांति प्रदान करने वाला है। वे धन्य हैं जो जनकसुता का नित्य स्थिर मन से ध्यान करते हैं। जानकी की शरण में जाने के पश्चात् और किसी के आश्रय की आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि जानकी को प्रसन्न करने का अर्थ साक्षात् विष्णु-अवतार राम को प्रसन्न करना है। देवी जानकी का ध्यान नारदपुराण में इस रूप में आता है- ततोध्यायेन्महादेवीं सीतां त्रैलोक्यपूजिताम्। तप्तहाटकवर्णाभां पद्मयुग्मं करद्वये॥ सद्रत्नभूषणस्फूर्जद्दिव्यदेहां शुभात्मिकाम्॥ नानावस्त्रां शशिमुखीं पद्माक्षीं मुदितान्तराम्। पश्यन्तींराघवं पुण्यं शय्यायां षड्गुणेश्वरीम्॥ मात्र संस्कृत अथवा हिन्दी भाषा में ही नहीं अवधी एवं अन्य लोक भाषाओं में भी सीताजी की महिमा का गुणगान किया गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी विनय-पत्रिका में जानकी अम्बा से स्पष्ट किया है कि बिना आपकी कृपा के भगवान् राम को प्राप्त करना संभव नहीं है कभी समय मिले तो कृपालु राम के समक्ष मेरी करुण-कथा भी हे जगजननि! सुनाइए जिससे यह तुलसीदास उनका गुण गाते हुए भवसागर से तर जाए |
| असीमित मौन |
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| वाणी चार प्रकार की होती है। नाभि में परावाणी, हृदय में पश्यंति,कंठ में मध्यमा वाणी और मुख में वैखरी वाणी निवास करती है। हम शब्दों की उत्पत्ति परावाणीमें करते हैं, लेकिन जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुख में स्थित वैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है। इनमें परा और पश्यंतिसूक्ष्म तथा मध्यमा व वैखरी स्थूल है। अनावश्यक वाणी को अपने मुंह से नहीं निकालना और आवश्यक कथन में भी वाणी का संयम हमारे लिए बहुत बडी साधना है। हमारे योग साहित्य में दो प्रकार के मौन का उल्लेख किया गया है। प्रथम मौन का सीधा संबंध वाणी से है, जो बहिमौनकहलाता है। अपनी वाणी को वश में करना, न बोलना बहिमौनके अंतर्गत आता है। दूसरा मौन आत्मा से जुडा है, जो अंतमौनकहलाता है। ईष्र्या-द्वेष या अपवित्र विचारों को अपने मन से निकाल कर आत्मोन्मुखीबनना अन्तमौनहै। दूसरों के हित के लिए कहा गया कथन भी मौन के अंतर्गत आता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने मौन की महत्ता जान ली है, वह दुख से कभी विचलित नहीं हो सकता। वह न तो सुख में मगन हो सकता है और न ही दुख से दुखी। वह राग, द्वेष, भय, क्रोध आदि विकारों से दूर रहता है। सच्चे अर्थो में ऐसे व्यक्ति ही साधु कहलाते हैं। यदि आप मौन रहते हैं, तो स्पष्ट है कि आप सहनशील हैं। आप यदि अध्यात्म-पथ की ओर उन्मुख होना चाहते हैं, तो मौन आपके लिए सशक्त माध्यम है। मानसिक तनाव, व्याकुलता और अशांति के क्षण में यह क्षण शांतिदायकहोता है। कहा गया है कि मौन व्रत में ही मुनि जनों की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहती है। जो कार्य बोलने से नहीं हो पाता है, वह इससे सहज, सरल बन जाता है। यदि आप कलह और निंदा से बचना चाहते हैं, तो उसका एकमात्र उपाय मौन है। |
पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करें। इस दरम्यान ढोल, नगाडे, घडियाल आदि भी बजाना चाहिए।
एक शुभ पात्र में शुद्ध घी लें और उसमें विषम संख्या [जैसे 3,5या 7]में बत्तियां जलाकर आरती करें। आप चाहें, तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारतीकहलाती है। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।
कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं।
यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।
जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।
नारियल- आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।
सोना- ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है।
यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।
तांबे का पैसा- तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।
सप्तनदियोंका जल-गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरीऔर नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि ज्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी। सुपारी और पान- यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेलभी कहते हैं।
नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।
तुलसी-आयुर्र्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।